Tuesday, November 3, 2015

मैं शाहरुख़ की बात से सहमत हूँ- बहुत इनटॉलेरेंस है हमारे देश में!

"There is extreme intolerance in India" - says SUPERSTAR Sharukh Khan
आज सुबह सुबह ये खबर ब्रेकिंग न्यूज़ की तरह हर जगह छायी हुई थी।
हमारे देश की लडकियां अक्सर शाहरुख़ की बातों से सहमत ही होती है। अगर नहीं होती तो सहमत करवाने के लिए शाहरुख़ का बस एक बार मुस्कुराना ही काफी है।
और क्योंकि मैं इसी देश में बढ़ी हुई हूँ तो शाहरुख़ की इस बात से मैं भी सहमत हो गयी।
सच है.... शाहरुख़ खान अगर भारत में न होकर किसी और देश में होते जहाँ उनके धर्म के प्रति कोई इनटॉलेरेंस नहीं है तो शायद वहां लोग उनकी पिक्चर मराठा मंदिर में इतने सालो से नहीं चलाते।
अगर हमारा देश ज़रा सा भी सेक्युलर होता तो शाहरुख़ के धर्म का ख्याल रखते हुए लड़कियां उनपर इस तरह फ़िदा न होती।
अगर भारत सभी धर्मो का एक समान आदर करता तो हर पिक्चर में 'राहुल' बनते शाहरुख़ खान की माँ फरीदा जलाल या सरदारनी कीरोन खेर इतनी आसानी से थोड़े ही बन जाती? और इस नाइंसाफी को दर्शक इतने प्यार से थोड़े ही अपनाते।
सच बहोत इनटॉलेरेंस है हमारे देश में।
इतना इनटॉलेरेंस है शाहरुख़ जी कि ये लिखते हुए मुझे ये डर है कि मेरी बेस्ट फ्रेंड स्वाती, जो आपकी सबसे बड़ी फैन है, कही मुझसे दोस्ती न तोड़ दे।

किसी ने कभी कहा था कि देश वैसा ही है जैसा आपको अपने आसपास दिख रहा है।
सोशल मीडिया और न्यूज़ चैनल्स से बाहर निकलकर एक बार आँखे खोलकर देखे.... कैसा है हमारा देश???

Monday, October 19, 2015

Kaafiya!!!!

कुछ इंतज़ार सा देखा था उसकी आँखों में मैंने
मेरे न आने पर जो आंसू बनकर छलकते रहे।
#KaafiyaMilaao

न काफ़िया मिलाया, न नज़्म कोई लिखी
उसने बस आह ही भरी थी
जिसको #शायरी समझ ली मैंने।
#मानबी

दिल हार चुके है अब जाँ भी दे देंगे,
इक #शेर  कहा तुमने और हम सब लूटा बैठे।
#मानबी

कुछ शेर सा लिख बैठते...कुछ शायरी सी बन जाती..
जब भी सोचा करते,आज सीधे सीधे तुमसे दिल की बात कहेंगे।
#मानबी

@KaafiyaPoetry
इक #ख्वाब सा बुना करते थे ज़िन्दगी की तेज़ धुप में,
अक्सर सर्द रातो में वही ओढ़ कर सुलाया है उसको मैंने
#मानबी

चाँद तोड़के ले आऊंगा कुछ ऐसा ही कहा था उसने
दिल को चाँद समझता मेरे ..तोड़ कर ले गया आखिर
#मानबी

चाँद सा कोई मिले यही ख्वाहिश रही मेरे मेहबूब की
खुद दाग लगा लिए किस्मत पे अपनी जब ये जाना मैंने
#मानबी
#KaafiyaMilaao @KaafiyaPoetry

Tuesday, October 13, 2015

Shaam !!

इक मैं हूँ जिसने तेरी याद में बिता दी उम्र सारी..
इक तू है की हर शाम का हिसाब रखता है...
#मानबी

#शाम होने को है, अब तो मेरी मोहब्बत की रौशनी ले लो...
की ताउम्र तो हुस्न की सहर नहीं रहती!
#मानबी

कुछ शाम सा चुभते देखा था तेरी आँखों में
सुबह की ख्वाहिश में मला करता था जिन्हें तू रात भर!
#मानबी

रात की महफ़िल के वास्ते सजने संवरने लगे है
हम #शाम ही से काफिये पे काफ़िया मिलाने लगे है।
#मानबी

© Manabi Katoch

Friday, October 9, 2015

दादरी का सच कौन जानता है???


#dadri #beeflynching #akhlaq ये सब ट्रेंडिंग है। जी हाँ जिन खबरों पर हम कभी शोक मनाया करते थे आज उनपर हम सिर्फ इसीलिए लिखना चाहते है क्योंकि वो ट्रेंडिंग है।

नहीं मैं यहाँ हर अखबार... हर न्यूज़ चैनल की तरह इसे हिन्दुओ के मुसलमानो पर हुए अत्याचार के प्रचार के रूप में दिखाने के लिए नहीं आई हूँ।

इसलिए यदि आप उनमे से है जिनका अख़लाक़ से दूर दूर तक कोई वास्ता नही, उसे मारने वालो का पता नहीं या दादरी का नाम ज़िन्दगी में पहली बार सुना हो और फिर भी आपको लगता है कि इस पूरी घटना के बारे मे आपसे बढ़कर ज्ञानी कोई नहीं है तो आगे पढ़ने का कष्ट न करे।

दादरी! ये नाम मैंने अपने जीवन में दूसरी बार तब सुना जब मिडिया ने बताया की ठीक बीफ बैन होने की घटना के बाद, ठीक बिहार के इलेक्शन से पहले, ठीक उस समय जब हिन्दू और मुसलमानो की एकता को तोड़ने की सबसे ज़्यादा ज़रूरत थी, तब दादरी में रहने वाले मोहम्मद अख़लाक़ को बीफ याने गाय का मॉस खाने की वजह से उसी के हिन्दू पड़ोसियों ने पीट पीट के मार डाला।

पर दादरी का नाम मैंने पहली बार तब सुना था जब मैं ग्रेटर नॉएडा के आम्रपाली नामक सोसाइटी में रहती थी।

दादरी गाँव इस सोसाइटी के बेहद पास था और इसलिए सभी गार्ड जो यहाँ तैनात थे इसी गाँव से आते थे।

इन चौकीदारों में से कौन हिन्दू था और कौन मुसलमान, मुझे नहीं पता। पर हर कोई साथ बैठकर खाना खाता था। एक वाक्या मुझे अब तक याद है। इसी सोसाइटी के एक दूसरे बिल्डिंग में रहने वाली मेरी एक सहेली ने मुझे कई बार बताया था की उनके बिल्डिंग का गार्ड बहोत सज्जन है। कई बार उसने, उसकी मदत की है। एक बार जब मैं उस बिल्डिंग में गयी तो मैंने देखा की वह गार्ड विवेकानंद की किताबे पढ़ रहा है।
पूछने पर उन्होंने बताया कि सारा दिन यूँही बैठे रहने से अच्छा वे किताबे पढ़ना पसंद करते है। और उन्होंने विवेकानंद की कई किताबे पढ़ी है। ये सुनकर एक बात समझ आई की हम अक्सर किसी भी काम करने वाले के या किसी भी जगह पर रहनेवाले के प्रति एक धारना बना लेते है। लेकिन ज़रूरी नहीं कि हमारी सभी धारणाये सही हो। गार्ड की नौकरी करने वाला व्यक्ति पढ़ने का शौक़ीन होगा, स्वामी विवेकानंद का भक्त होगा इसकी हम कल्पना भी नहीं करते। दादरी जैसे गाँव में रहनेवाला एक साधारण इंसान इतना ज्ञानी होगा इसका हम कभी विचार भी नहीं करते।
दादरी में रहनेवाले ये सभी लोग... या इन जैसे हमारे और आप ही की तरह के लोग क्या इतने जाहिल है?
मुझे यकीन नहीं होता।

एक गाय का खो जाना, एक अफवाह का फैलना, मंदिर में अनोउंसमेंट होना और एक घंटे के अंदर हज़ार लोगो का जमा होकर बिल्कुल एक ही तरह एक ही दिशा में सोचना और फिर उस सोच को बिना किसी भी विरोध के अंजाम दे देना...... क्या कुछ भी संदेहांस्पद नहीं लगता?

हम में से हर कोई... चाहे हिन्दू हो या मुसलमान इस बात को शर्मनाक घटना मानता है। तो दादरी में रहनेवाले लोगो में ऐसा क्या अलग है जो उनकी सोच हमारी सोच से इतनी अलग हो गयी और वो भी एक घंटे के भीतर?

आप अपने आप को उस भीड़ का हिस्सा मानकर सोचे। क्या आपके विचार एक घंटे में बदल जाते? क्या किसी अनोउंसमेंट के चलते आप अपने ही पडोसी को मार देते? क्या आप सिर्फ इसलिए एक खुनी बन जाते क्योंकि 999 लोग आपको खुनी बनाना चाहते है?

दादरी से 1500 किमी दूर यहाँ चेन्नई में बैठकर मैं इस बात पर कोई टिपण्णी नहीं करना चाहती की वहां क्या हुआ होगा। पर हाँ इतना ज़रूर कहना चाहती हूँ की कानो सुनी बात अक्सर सच नहीं होती।

बरसो से हमारे देश में हम अपनी अपनी पसंद का खाना खाते आ रहे है.... फिर अचानक ऐसा क्या हो गया जो हम इतना बदल गए? या फिर हम नहीं... कुछ और ही बदला है?

बरसो तक हिन्दू और मुसलमान को लड़ाकर अंग्रेज़ हम पर राज करते आये थे। पर देश के लूट जाने के बाद हमें इस बात की भनक लगी।

कही ऐसा न हो की एक बार फिर हम वही गलती दोहराएं!!!!

Saturday, August 29, 2015

माँ, मर्डर और मिडिया!

पिछले चार दिनों से हर न्यूज़ चैनल, हर अखबार और हर भारतीय एक ही चीज़ को लेकर परेशान है .....की "आखिर एक माँ कर्ण अपनी ही बेटी को क्यों मारा?"

चर्चा पे चर्चा, इंटरव्यूज पे इंटरव्यूज और एक एक नए खुलासे। मानो हमारे देश की उन्नति बस इसी एक केस के सुलझने पर निभर करती हो।

पर इस केस में ऐसा क्या है जो आप सभी को इसमें दिलचस्पी है?

नहीं! अब सारा दोष मीडिया पर न मढ़ दीजियेगा। आप!!...आप, जो इस देश के एक आम से नागरिक है, आपको भी इस केस में उतनी ही रूची है। तो जब अर्णब गोस्वामी इस बार ये कहे की 'द नेशन वांट्स टू नो' तो उसे झुटलाईयेगा नहीं। बेचारा इस बार बिलकुल ठीक बोल रहा है।


लेकिन आप सभी को क्या हैरान कर रहा है? क्यों इसी केस में दिलचस्पी है आपकी? ऐसे हज़ारो मर्डर केस देश में चल रहे है जिसकी पुलिस बेचारी बिना कोई जवाबदेही दिए शिनाख्त कर रही है। ऐसी कई माँये है जो अपनी प्रतिष्ठा बचाने के लिए अपने ही बच्चे का खून कर देती है। फर्क सिर्फ इतना है की हर कोई इन्द्राणी मुख़र्जी की तरह हाई प्रोफाइल नहीं होती। और न ही वे अपने बच्चे के 24 बरस का होने का इंतज़ार करती है।

क्यों? यकीन नहीं होता? या हमेशा की तरह सच से मुह मोड़ लेना चाहते है?
देश के किसी भी अनाथालय में चले जाईये, वहाँ आपको 90% बच्चे अविवाहित माँ के ही मिलेंगे। कुछ को ये माँए खुद छोड़ जाती है और कुछ को इन्द्राणी जैसी माँए शीना की तरह मरने के लिए किसी कचरे के डिब्बे में फेंक देती है। जो बच जाते है वो अनाथ कहलाते है और जो नहीं बचते वो तो किसी गिनती में ही नहीं आते।

लेकिन हमारे समाज की विडम्बना देखिये। हमें शीना बोरा से सहानुभूति है, जो अब मर चुकी है। हम और हमारी बेहद सक्षम मीडिया दिन रात ये सोच रही है की कातिल कौन है। यदि शीना की माँ कातिल है तो क्यों है? और यदि पैसो या प्रतिष्ठा की खातिर ये सब हुआ तो कितनी शर्मनाक बात है ये किसी भी माँ के लिए। 

पर यही मीडिया, यही हम, उन बच्चों से कोई सहानुभूति नहीं रखते जो ऐसी ही प्रतिष्ठा की बली चढ़कर रह गए। शायद इसलिए क्यों की उन बच्चों की माँ पीटर मुख़र्जी जैसी बड़ी हस्ती की पत्नी नहीं होती। या उनकी माँए इन्द्राणी मुख़र्जी की तरह किसी बड़ी मीडिया कंपनी की सी.इ.ओ नहीं होती।

कर्ण की व्यथा शायद इसीलिए महाभारत में दर्ज़ है क्योंकि वो महारानी कुंती का पुत्र था। वर्ना न जाने ऐसे कितने कर्ण रहे होंगे इतिहास में!

ये मर्डर मिस्ट्री तो हमारे आपके या मीडिया के दखल न देने पर भी जैसे सुलझनि है वैसे ही सुलझ जायेगी।पर जिन नवजात शिशुओ का क़त्ल उनकी माँ समाज के डर से कर देती है, उनकी स्थिति हमारे दखल देने पर ही सुधरेगी।

काश मीडिया उन मुद्दों पर दिन रात सोचती जिनसे समाज में कोई तबदीली आती न की उन मर्डर मिस्ट्री पर जिनसे समाज को कोई फर्क नहीं पड़ता।

Thursday, August 20, 2015

Main 'Maa' hu...Mujhe sab kuch nahi milta..

मैं माँ हूँ, मुझे सबकुछ नहीं मिलता...
कभी साँसे नहीं मिलती,
तो कभी समंदर नहीं मिलता।

वक़्त की बाज़ी हारकर रह जाती हूँ अक्सर
वक़्त पे मुझको या घर नहीं मिलता या कैरियर नहीं मिलता

दोनों दुनिया एक ही में समेटूँ किस तरह
कभी अपने ही बच्चों का बचपन नहीं मिलता
तो कभी दफ्तर की तरक्की का बड्डप्पन नहीं मिलता।

घर पर रुक जाऊ तो बेकार समझते है वो मुझे
बाहर निकल जाऊ तो गद्दार कहते है मुझे
दोनों ही तरफ मुझको सुकून नहीं मिलता
मैं माँ हूँ मुझे सबकुछ नहीं मिलता...
कभी साँसे नहीं मिलती,
तो कभी समंदर नहीं मिलता।

Tuesday, August 18, 2015

गुलज़ार.... तुम्हारे जन्मदिन पर... कुछ यूँ ही!

मुझे नहीं पता तुम कितने साल के हो। लोग कहते है तुम 81 के हो गए हो। अच्छा ठीक उलटा के देखु तो अब बालिग़ हुए हो।मेरे लिए तो तुम हमेशा 18 बरस के ही रहे। अब भी हो। ये तो अब हुआ की फेसबुक और ट्विटर पर जब तुम्हारा नाम ट्रेंड करने लगा तो पता चला की आज तुम्हारी सालगिरह है। वर्ना तो तुम मुझे किसी अवतार से लगते थे, जिसका जन्म नहीं हुआ, जो प्रकट हुआ हो।

कितनी अजीब बात है कि गूगल के आ जाने से अब हर किसी को ये पता है कि तुम्हारा नाम क्या है। इतने साल तुम्हे पढ़ते रहने के बाद भी मुझे तुम्हारा असली नाम नहीं मालूम हुआ। मैंने तुम्हे नाम की तरह सोचा ही कहाँ कभी। मेरे लिए तो तुम बस एक एहसास थे जिसका नाम नहीं होता। इस तरह के एहसासो को नाम मिल जाए तो कहते है वो बदनाम हो जाते है। तभी तो तुम्हे बस महसूस किया... नाम नहीं सोचा।

अच्छा नदियो में तुम्हे सरस्वती सबसे प्यारी है..है ना? तभी तो उसका मोल समझाने के लिए तुमने 'त्रिवेणी' रच डाली। लोग गंगा जमना में उलझे रहे और तुमने चुपके से सरस्वती खोज निकाली। जानते हो...मैं भी इसी आशा में छुपी रही कि एक दिन इसी तरह तुम मुझे भी खोज निकालोगे। पर हर छुपी हुई नदी सरस्वती तो नहीं होती... है ना?

बोस्की ब्याहने का वक़्त आया तो तुम उदास से लगे। बोझिल सी उन रातो को जब पश्मिनि जामा पहना रहे थे, तब मैं  उन सर्द रातो के गर्म होने के इंतज़ार में बिना स्वेटर के ही चाँद देखने निकल पड़ती थी।

रावी पार की पहली कहानी पढ़ी तो यकीन हो चला कि कम-स-कम तुम्हारा मज़हब तो मेरे मज़हब से मेल खाता है। नहीं नहीं ... अब्बा से शादी की बात करने के लिए नहीं। पर यूँ ही... तुमसे कुछ भी मेल खाता मिले तो अपने आप पे फक्र सा होता था, इसीलिए।

और फिर तुमने 'परवाज़' पढ़ी । जब अब्दुल कलाम साहब का इंतकाल हुआ तब किसीने ये सुनने को कहा। तुम यकीन करो न करो पर लगा मृत्यु तभी सफल होती है जब गुलज़ार तुम्हारी ज़िन्दगी पढ़ ले।

काश तुम किसी दिन मुझे सरस्वती सी ढूंढ निकालो।

काश तुम कभी अपनी पश्मिनि रातें मुझ पर ओढ़ा दो।

काश तुम सम्पूर्ण होकर भी गुलज़ार रहो और मोहब्बत का मज़हब संभाले रखो।

काश तुम किसी दिन मेरी ज़िन्दगी पढ़ो और मेरी मौत को मुक्म्मल कर दो।

काश तुम 81 बरस और जियो और फिर भी 18 के लगते रहो।

जन्मदिन मुबाराक हो!!

Friday, August 14, 2015

आज़ादी 'छोटू' की!!


आज़ादी की 70 वि वर्षगाठ मनाते मनाते,
अचानक देखा एक 7-8 साल के बच्चे को कुछ सामान ढोकर लाते।
उसे आता देख हमें याद आया..
अरे ये तो वही सामान है जो हमने अपनी सोसाईटी की दूकान से है मंगवाया।

सामान उसके हाथो से लेते लेते, हमने यूँही पूछा..
"छोटू आज तो पंद्रह अगस्त है, हर कोई आज़ादी के जश्न में मस्त है,
फिर तू ही क्यों अपने रोज़ के काम में व्यस्त है?
जा जाके आज़ादी मना...
देख सारे बच्चे पतंग बना रहे है,
जा जाकर तू भी बना..."

ये सुनकर छोटू मुस्कुराने लगा और मुस्कुराते मुस्कुराते, हमसे कहने लगा..

"क्या मैडम.. काहे को झूठे सपने दिखाते हो?
ये आज़ादी वाज़ादी तो आप बड़े लोग फ़ोकट में मनाते हो।
पर हम जैसो को इसकी कीमत चुकानी पड़ती है।
एक दिन मज़दूरी न करो तो खाली पेट रात गुज़ारनी पड़ती है।
आज काम नहीं करूँगा,
तो रात को क्या खाऊंगा?
अरे मेरा क्या है, जिस दिन फ़ोकट में खाने को मिलेगा,
उसी दिन आज़ादी मना लूंगा!!!

ये सुनकर हम सुन्न से रह गए।
तिरंगे को लहराते देख ये सोचते रह गए
कि क्या छोटू को कभी फ़ोकट में खाना मिल पायेगा?
छोटू जैसा हर बच्चा क्या कभी भी आज़ादी मना पायेगा???

Thursday, July 30, 2015

हम कौन होते है याकूब की सज़ा तय करने वाले?

30 July 2015

आज सुबह 1993 में हुए मुम्बई ब्लास्ट के लिए ज़िम्मेदार आरोपी याकूब मेमन को फांसी दे दी गयी।
सुना है हमारे देश के कई लोग (जिनका मुम्बई ब्लास्ट के 257 मृतको या 713 पीड़ितों में से किसीसे भी कोई वास्ता नहीं है) इस बात को दुखद मानते है।

कुछ को अपने ही संविधान पे शर्म आ रही है, ये सोचकर की आखिर ऐसे महापुरुष को 22 साल तक पाल पोसकर बूढ़ा करने के बाद दुबारा कोई महान काम करने के लिए छोड़ने की बजाय देश के सर्वोच्च न्यायालय ने फांसी कैसे दे दी।

कुछ इस बात को बेहद निर्मम मानते है की किसीको उसके जन्मदिन पर ही मार दिया जाए।

कुछ कहते है की जब फांसी न देने का कहकर जनाब से इनफार्मेशन ली गयी थी तो देश के इस ईमानदार नागरिक के साथ ऐसा धोखा आखिर क्यों किया गया?

कुछ कहते है की उसके किसी जाती विशेष का होने की वजह से उसके साथ ये नाइंसाफी हुई।

एक भाईसाहब को ये बात भी बुरी लगी की जज ने मनुस्मृति में लिखे एक वाक्य का उदहारण देकर फांसी को न रद्द करते हुए याकूब जी का अपमान कर दिया।

इसी दौरान एक न्यूज़ फ़्लैश और आया.... "जम्मू कश्मीर में पाकिस्तान ने ceasefire का उल्लंघन कर दिया। एक जवान शहीद!"

किसी ने इस बात पर दुःख नहीं जताया।

किसीको पता नहीं की इस जवान का जन्मदिन कब था।

किसी ने नहीं सोचा की इस जवान का इस उम्र में चले जाना इन्साफ था या नहीं।

किसीको नहीं पता की ये जवान किस धर्म के इंसानो को बचाते हुए शहीद हुआ।

हम ....जो अपने घरो में सुरक्षित बैठे सिर्फ 10-12 न्यूज़ चैनल्स के ज़रिये अपनी राय बनाते है...

हम....जो किसी आतंकवादी को उतना ही जानते है जितना उसके द्वारा सताये हुए पीडितो को....

हम... जो सिर्फ हादसों को तभी हादसा समझते है जब वो हादसा हमारे साथ हो जाता है...

क्या हमे इन हादसों के शिकार लोगो के....हज़ारो जवानो के ...गुनाहगारो के लिए सज़ा तय करने का अधिकार है?

क्या हमें ये तय करने का अधिकार है की एक बेटे से उसकी माँ छीन लेने वाले को.... एक हस्ते खेलते परिवार से उनकी खुशियाँ छीन लेने वाले को सहानुभूति की अमूल्य भेंट दे?

हाँ देश में कई गुनहगार है जिन्हें ऐसी ही सज़ा मिलनी चाहिए। पर क्या याकूब मेमन की सज़ा माफ़ हो जाने से उन्हें फांसी हो जाती? नहीं!
पर हाँ अब सुप्रीम कोर्ट के पास हमेशा एक उदाहरण होगा जिसके बिनाह पे इन जैसो को ऐसी ही सज़ा दी जा सकेगी!
और जहाँ बात धोखे की है तो कई बार भस्मासुर से दुनिया को बचाने के लिए मोहिनी बनकर छल करना ज़रूरी होता है। अपने बचाव में भी वार न करने वाले सांप की कहानी भी तो आपने सुनी होगी!

1993 मुम्बई ब्लास्ट में म्रत्यु को प्राप्त सभी आत्माओ को मेरी श्रधांजलि!!!

Friday, July 17, 2015

आपकी अबीहा....


अब्बु ...क्यों उदास हो
मैं लौट कर आउंगी

जब भी ईद पर सेवइयां बनेंगी
मैं उसकी मिठास बनकर आउंगी

जब भी दो लोग ईद मुबारक कह गले मिलेंगे
मैं उनकी मोहब्बत बनकर आउंगी

सजदे में जो भी झुकेगा
उसकी इबादद बनके आउंगी

अब्बु...क्यों उदास हो
मैं लौट कर आउंगी....

-आपकी अबीहा



Thursday, July 16, 2015

जाना पहचाना अनजाना सा मेरा शहर....

चंद्रपुर! मेरा शहर.. मैंने कभी चंद्रपुर का नाम खबरों में नहीं सुना। खबरे जिनमे अक्सर खून, बलात्कार, धोखाधड़ी और लूटमार के लिये ही जगह होती है, उनमे चंद्रपुर के लिए कोई जगह नहीं थी। सो हम बेफिक्र रहे...हमेशा... सारा चंद्रपुर घर जैसा लगता। उतना ही सुरक्षित जितना घर होता है। सारे लोग उतने ही अपने और नेक जितने घर के लोग होते है।

जब शादी के बाद गुडगाँव में रहने लगी तो माँ हमेशा डरती थी क्योंकि उन्होंने गुडगाँव का नाम अक्सर खबरों में सुना था। सच कहू तो थोडा थोडा डर तो मुझे भी लगता था। चंद्रपुर में रास्ते पर चलते हुए कभी नहीं सोचा की शायद कोई पीछे है जो पर्स छीन लेगा या ज़बरदस्ती मुह बंद करके उठा ले जायेगा। पर कभी गुडगाँव में ऑफिस से आने में देरी हो जाती तो लगता जैसे भेड़िये पीछा कर रहे हो।
इसके बाद भिवाड़ी और नॉएडा जैसे crime capitals में भी रही। इन खबरों में छाए रहने वाले शेहरो से जब भी चंद्रपुर लौटती तो एक सुकून सा मिलता। ऐसा लगता जैसे किसी गटर से निकल कर गंगा किनारे आ गयी हूँ। और गंगा का किनारा तो मैला हो ही नहीं सकता।
पर 32 सालो तक जिन जगहों पर नहीं गयी थी। इस साल उन जगहों के बारे में लिखने की उत्सुकता मुझे वहा ले गयी। इसी सन्दर्भ में अपने इस सुरक्षित शहर के एक अनाथ आश्रम में जाना हुआ। वहा की संचालिका को आने में वक़्त था तो वहा के बच्चों के साथ खेलने लगी। सारी लड़कियां थी। हँसती खेलती बिलकुल भोली भाली लडकियां। छोटा सा खेल था पर उनके ठहाकों की गूंज से लग रहा था मानो उन्हें कोई खज़ाना मिल गया हो।
मैंने सबका नाम पूछा। सबसे हाथ मिलाया। और ढेर सारी हंसी लेकर संचालिका से मिलने गयी।
संचालिका ने सब बच्चों के बारे में बताया। ये भी बताया की कौनसी लडकिया दत्तक दी जा सकती है। जिन प्यारी सी बच्चियो के साथ मैं अभी अभी खिलखिलाकर आई थी, पता चला उनमे से सबसे प्यारी बच्ची दत्तक नहीं दी जा सकती। कारण पूछने पर पता चला की उसके माँ बाप है। बात समझ ही नहीं आई की माँ बाप के रहते हुए 3 साल की दिव्या (नाम बदला हुआ) अनाथ आश्रम में क्या कर रही है?

"उसका बलत्कार हुआ है"
संचालिका के ये शब्द मानो किसी तीर की तरह मुझे चुभे...एक ऐसा तीर जिसके चुभने से मैं अपने शहर के प्रति भरोसे के जिस आसमान पर बैठी थी वहा से सीधा धरती पे आ गिरी!!!
दिव्या का पिता शराबी है और माँ मनोरोगी । दोनों ही भीख मांगकर गुज़ारा करते है और सड़क पर ही सोते है। ऐसे में इस बात की कोई गरंटी नहीं है की दुबारा इस लड़की के साथ ऐसा नहीं होगा। इसलिए पुलिस उसे यहाँ छोड़ गयी थी।
मैं दिव्या से दुबारा मिली...कई बार मिली... वह वैसी ही निष्पाप थी...उतनी ही प्यारी और भोली... पर मैं अचानक बदल गयी। मेरा शहर मेरे लिए हमेशा के लिए बदल गया।
अगले दिन मुझे एक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए सोन्डो जाना था। जिस शहर में मैं 32 साल तक अकेले बिना डरे घूमती रही उसी शहर से टैक्सी में अकेले जाने में मुझे खौफ सा आया।
दिव्या से आखरी बार मिलकर घर वापस जाते हुए रास्ते से गुज़र रहा मेरे शहर का हर शख्स अपराधी सा लगा.....

Friday, July 3, 2015

Daadi ki Kahaani


मेरी दादी तभी गुज़र गयी जब मैं सिर्फ दस साल की थी। पर उनकी सुनाई कहानियाँ मुझे अब तक याद है। उनमे से एक किस्सा कुछ इस प्रकार था।
एक बार एक सामाजिक कार्यकर्त्ता एक नए मोहल्ले में रहने आई। उनके पड़ोस वाले घर और उनके घर के बीच एक बहोत ऊँची दिवार थी सो कई दिन गुज़र जाने के बाद भी वो अपने पड़ोसियों को कभी देख नहीं पायी थी। पर रोज़ सुबह जब वे चाय का कप और अखबार हाथ में लिए अपने बरामदे में बैठती तो पड़ोस से ज़ोर ज़ोर से गालियो की आवाज़ आती।
जिज्ञासा वश् समाजसेवी महिला ने दिवार पर कान लगाकर सुना तो समझ आया की रोज़ सुबह पड़ोस में रहने वाली बहु आँगन में झाड़ू लगाती है और वही बैठी उसकी सांस उसे गालियाँ देती रहती है। समाजसेवी महिला को ये सुन बड़ा क्रोध आया। पर उन्होंने सोचा की वे कुछ दिन तक और देखे की क्या होता है। पर ये तो रोज़ का किस्सा था। एक तरफ बहु के झाड़ू लगाने की आवाज़ और दूसरी तरफ सांस का ज़ोर ज़ोर से चिल्लाना "बहु तेरे सत्यानाश हो....बहु तू नर्क में जाये...हाय मेरी फूटी किस्मत जो तुझे घर ले आई" ...वैगारह वैगारह।
समाज सेवी महिला से अब रहा न गया। उसने सोचा की ये बहु कितनी सभ्य और शालीन महिला है की सांस के इतनी गालिया देने पर भी बिलकुल चुपचाप झाड़ू लगाती रहती है। आखिरकार एक दिन समाजसेवी महिला एक सीढ़ी लेकर आई और उस पर चढ़कर दिवार के उस तरफ देखने लगी। पर जो उसने देखा उससे उसकी सिट्टी पिट्टी गुल हो गयी।पड़ोस वाली सांस अपाहिज थी और बरामदे में बैठे बैठे पापड़ बेल रही होती थी। बहु झाड़ू लगाते लगाते बीच बीच में उसे झाड़ू उठाकर मारने के इशारे करती तो कभी पापड़ पर धुल उड़ा देती। जब जब वो ऐसा करती सांस उसे गालियां देती।
इस कहानी से दादी ने हमें ये सीख दी की कभी किसीकी सुनी सुनाई बात पर विश्वास न करे। और बिना सच्चाई जाने किसी के बारे में कोई धारना भी न बनाये।
पर हमारे देश में अक्सर यही होता आया है। हम by default महिलाओ को अबला और भोला ही समझते है।हाल ही में खबर आई की अत्यंत सुसंस्कारी अलोक नाथ जी ने सामाजिक कार्यकर्त्ता कविता कृष्णन जी को 'bitch' कह डाला। और जैसा की हमारे देश के संस्कार है की यदि आप महिला है और किसी पुरुष ने आपको गाली दी तो आप बेझिझक शोर मचा सकती है, चिल्ला सकती है, उस पुरुष की (माफ़ कीजियेगा) माँ बहन कर सकती है। ओपन लेटर्स लिख सकती है। माफ़ी मंगवा सकती है। जी हाँ आपको भारतीय नारी होने की वजह से ये सारी सहूलियते मिली हुई है। आपके आंसू देखके आपकी कहानी छापने आये रिपोर्टर आपसे भूल के भी ये नहीं पूछेंगे की 'माताजी, बहनजी गाली देने जैसा क्या आपने कोई कार्य किया था?"।
पर यदि आप इसी महान देश के एक पुरुष नागरिक है तो आप चाहे प्रधान मंत्री जैसे आदरणीय पद पर भी हो तब भी आपको कोई भी महिला नागरिक "#LameDuckPM" अर्थात "एक नंबर का आलसी" कह सकती है। अरे तो क्या हुआ की कुर्सी संभालने के बाद से आपने एक भी छुट्टी नहीं ली। ना!! हमारे देश की महिलाओ को पूरा अधिकार है आपके लिए किसी भी तरह की भाषा का उपयोग करने का..समझे!!
अच्छा हाँ हमारे यहाँ की महिलाये आपको #SelfieobsessedPM भी बोल सकती है। इसमें बुरा मानने वाली कोई बात नहीं है। आपको सिर्फ इतना याद होना चाहिए की आपको महिलाओं की #respect करनी है। चाहे वो जूता धोकर आपको सरेआम मारे पर आप उनका आदर करते रहे।
ये सारा बवाल हमारे माननीय प्रधान मंत्री जी के मन की बात से शुरू हुआ था। हरयाणा के बीबीपुर जिल्हे के पंचायत श्री सुनील जागलान की तारीफ करते हुए मोदी जी ने उनके चलाये #SelfieWithDaughter के अभियान को देशव्यापी सफलता देनी चाही। इस छोटे सरल और पवित्र अभियान को बेवजह Snoopgate से जोड़ना कहा तक सही था?
हम सब जानते है की गणेशोत्सव पहले सिर्फ घरो में मनाया जाता था।पर स्वराज पाने के लिए लोगो को एकत्रित करना ज़रूरी था और इसलिए माननीय लोकमान्य तिलक जी ने इस उत्सव को सार्वजानिक बनाया।एक देश को चलाने के लिए ...किसी मुहीम को चलने के लिए... उस देश की जनता का एकत्रित होना अनिवार्य है। उनमे उस मुहीम के प्रति जागरूकता तथा सकारकत्मक्ता का होना बेहद ज़रूरी है। #SelfieWithDaughter शायद वैसी ही एक कोशिश थी जिसे देश में ही नहीं विदेश में भी सराहा गया। परंतु कुछ लोगों की नकारात्मक सोच ने इसे एक भद्दा मज़ाक बना दिया।
कविता जी! श्रुति जी! मैं भी उन सब लोगो का पुरज़ोर विरोध करती हूँ जिन्हें मर्यादा में रहकर बात करना नहीं आता। पर मर्यादा किसी लिंग विशेष की ज़िम्मेदारी न मानी जाये तो अच्छा!
अंत में दादी की कहानी के अनुसार आप सब लोगो से विनती है की ये स्वयं तय करे की गाली देती सांस गलत थी या झाड़ू दिखाती बहु???
मानबी कटोच
Published on Mind The News (www.mindthenews.com)

http://www.mindthenews.com/reply-to-shruti-seths-open-letter/

Friday, June 19, 2015

Kuch Nazm Aapki Nazar 2


अंजाम-ए-मोहब्बत से डरता रहा
खुद मोहब्बत न की, औरो की मिसाले देता रहा
डर था उसे मैं नींदे चुरा लूंगा उसकी
तिजोरियों से निकाल निकालकर नींद लेता रहा
#Manabi

काली घटाओ से तुम खौफ न खाया करो
बारिशो का मौसम है, घर वक़्त पर आया करो :)
#Manabi

ये मसरूफियत ये बहाने सब समझते है सनम।
इश्क़ में पहले भी भूले जा चुके है कोई नयी बात नहीं।
#Manabi


मेरे बगैर तन्हा रहने की शिकायत करता रहा।
गैरो की महफ़िल में न जाने किसकी खातिर जाता रहा।
#Manabi


मेरे ख्वाबो में तन्हा आनेवाले
लगता है तुझको मेरी नियत का पता नहीं अब तक
#Manabi



वो कहते थे अपनी पाँव चादर में रखो
आँसमा को चादर समझता था मैं वो ये जानते न थे
#Manabi



पत्थर होता तो जलकर भी साथ निभाता
मोम था मेरा मेहबूब..ज़रा सी लौ से पिघल गया..
#Manabi



फासला इतना रखो की जल न जाओ कही..
मोम हो...मुझसे लिपटने में गल न जाओ कही..
#Manabi




उसकी आँखों में मैं बसता था ताबीर तो होना ही था
मेरी आँखों में ख्वाब बनकर जो रहा हकीकत हो न सका
#Manabi



ग़लतफहमी की यही वजह काफी थी दोस्त
अखबार में अक्सर सिर्फ सूरत छपी तेरी...
नियत ही न छपने पायी
#Manabi



तेरी अपनी हसरत हूँ तेरे दिल के सिवा कही न रह पाउँगा
ठुकरा न मुझको जल्द दिल से निकल हकीकतों में बदल जाऊंगा
#Manabi




भीड़ में रहकर भी न खोने का मज़ा और
अपनी राहो पे रहकर भी भटकने का मज़ा और
#Manabi




रेत का बना हूँ..छूने से डेह जाऊ न कही।
तू मुझे पत्थर समझता है तो पत्थर ही सही।
#Manabi




ताउम्र हिसाब उसके सवालो देता रहा मैं
खुद अपने उधारी का हिसाब माँगा तो रिश्ता बना लिया उसने
#Manabi



हैरानगी है की मुझे जानता भी न था वो
पर सरहद पे जान कर मेरे लिए जान देनेवाला वो अजनबी ही था
#Manabi


खुद पर्दा गिरा के अक्ल पे हमारे
मेहबूब मेरा कहता की हम कुछ नहीं जानते
दर्द के पन्ने पलटकर देखो
फिर कहना की हम कहना नहीं मानते
#Manabi


न मिल मुझसे काली अँधेरी रातो में
डर है मुझे तस्सव्वुर में तू मेरी नींदे न चुराकर ले जाये कही
#Manabi


है तेरे मेरे दरमियान जो
वो अपना राज़ ए ख्वाब है
देखना मेरे हमनफ़ज़ तू किसी को ये बता न दे
#Manabi


मैं उसकी हसरतो का तामील बनने में इतना मशगूल रहा
मेरी चाहत में मरा जाता था वो मुझे मालूम न था।
#Manabi



रातो को सोता न था वो मेरे इंतज़ार में
ख्वाबो में आता रहा मैं उसकी तलाश में
#Manabi



गुफ्तगू तो नहीं बस हाल ही बता देता है वो
सामना रोज़ होता है मगर आइना दिखा देता है वो
#Manabi


आसमाँ पे दिखने लगे है पंछी नए आजकल
लगता है बच्चों को भी अब बड्डपन की तलाश है
#Manabi


मेरी जान से खेलता रहा उम्र भर
मेरे कातिल को अब मेरे दिल की तलाश है
#Manabi


न दोस्तों को न दुश्मनो को ढूंढता हु मैं
कई रोज़ से भूखा हूँ, मुझे रहमदिली की तलाश है
#Manabi


तुम जुगनुओं की तलाश में सितारों को न भुला देना
वो चमकते तो बहोत है, पर जीते नहीं ज़्यादा
#Manabi



कुछ दूर ही सही, तू साथ चलेगा तो निखर जाऊंगा
मुक्कद्दर में न सही, दिल में भी रहेगा तो संवर जाऊंगा
#Manabi


मैं कलम से उनके दिल को छू लूँ न कही
यही सोचकर तलवार उठाये रहते है लोग
#Manabi


नज़दीक जितना भी हो दिल तक न पहोचने पायेगा
तू पहलु में रहे न रहे, दिल से न सरकने पायेगा
#Manabi


अफवाहें तुमने सुनी होंगी मेरे जिंदा होने की
दिल जलाकर कौन जीता रहा है सनम
#Manabi


बिन कुछ पाये लिखनेवाले
अक्सर तुझको पढ़कर सोचता हूँ
तेरे इस न पाने से मैंने क्या कुछ जाना है
#Manabi


कोई किसीकी तरह होता तो मैं जी लेता
किसी भी नाम से हो बस जाम होता तो मैं पी लेता
#Manabi


सदका ए झटको का सफ़र है ज़िन्दगी
जलसा ए हिसाबो की कबर है ज़िन्दगी
#Manabi


मोहब्बत बेशक न करो, नफरत न करना
सोहबत में रहो न रहो यादो में रहना
#Manabi


चाहत पे काश बस मेरा भी होता
मैं फिर यही चाहता की तुझे कोई और चाहता न हो
#Manabi



पत्थर बन गया हूँ तेरे इंतज़ार में
तेरे आने की देर है बस.. दिल के पिघलकर दरिया बनने में
#Manabi


यूँ तो दूर दूर तक नहीं कोई रिश्ता तुझसे ग़ालिब
फिर भी ये गुमाँ है की मेरी ही तरह तू भी बदगुमाँ रहा होगा
दर्द से भरकर जिस तरह छलकता है पैमाना मेरा
इसी तरह तूने भी अपना हर शेर कहा होगा।
#Manabi


















Thursday, June 18, 2015

रवीश को इस्तिफु का जवाब


मेरे प्यारे रवीश
हाँ मैं तुम्हे रवीश ही बुलाऊंगा ; तुमने कभी मुझे जानने की, समझने की कोशिश जो नहीं की।
बस दुसरो की जेब में मुझे ढूंढते रहते हो..कभी खुद भी मुझे अपनी जेब में, या दराज़ में ही रख लिया करो।
पिछले 19 साल से यही... इसी ndtv में लगे हुए हो। तुम क्या जानो राजनीति में नैतिकता के नाम पर मुझे दिए जाने का दर्द?
पांच दिन से तुम्हारे भाई बंधू मेरी मांग किये जा रहे है। कभी सोचा है की यूँही पहले की तरह मांगे जाने पर मैं तपाक से दिया जाता रहा तो मेरी क्या value रह जायेगी? नहीं न? अरे तुम क्यों सोचोगे भाई? तुम्हारी तो खुद की नज़रो में मेरी कोई value ही नहीं है। होती तो आज तक एक बार तो मुझे दिया होता। अच्छा बड़ा कहते हो की मुझे गूगल पर तुमने बहोत ढूंडा। बस रहने दो!! गूगल पर सच्चे दिल से ढूंढने से तो भगवान् और अडवाणीजी भी मिल जाते है, मैं तो फिर भी छोटा सा इस्तीफा हूँ। हाँ वही छोटा सा इस्तीफा जिसे राजकुमार अपनी जेब में लिए फिरते थे।
ना! मोटा तो मैं रत्तीभर भी ना हुआ हूँ। हाँ शातिर ज़रूर हो गया हूँ। इतने सालो में इतना तो तेज़ हो ही गया हूँ की कहाँ मांगे जाने पे दिए जाना है और कहाँ गुपचुप ही जेब में रह जाना है ये खूब समझता हूँ।
मैंने अपने पे लिखी हर कहानी पढ़ी है रवीश बाबू। जैनेन्द्र की भी और गजेन्द्र (किसान) की भी। फर्क सिर्फ इतना है की जैनेन्द्र की कहानी 1937 में लिखी जाने के बावजूद सबको याद है। उस त्यागपत्र को पढ़ तुम भी रोये थे और गजेन्द्र के जीवन से दिए त्यागपत्र को पढ़ सिर्फ मैं रोया था।हर त्यागपत्र के पीछे एक कहानी होती है मेरे दोस्त। तुम्हारे दफ्तर में दिए जाने वाले गुड बाय मेल की भी कोई कहानी होगी। पर उन्हें कोई नहीं पढता क्योंकि उनकी हफ्ता दर हफ्ता मांग नहीं होती।
खैर तुम्हारा पत्र मैंने दो बार पढ़ा जैसा तुमने कहा था। हंसी भी आई पर मैं हँसते हँसते कम ही निकलता हूँ ये तुम्हे पता होना चाहिए था। अक्सर मैं मायूस होकर ही निकल पाता हूँ।
मैंने तो तुम्हारा पत्र सब दोस्तों में शेयर किया। तुम भी मेरा ये जवाब शेयर करोगे न?
तुम्हारे हाथ से किसी दिन लिखे जाने की चाह रखने वाला
तुम्हारा
इस्तिफु :)

(रवीश जी का इस्तीफ़ू को पत्र कुछ इस तरह था....

इस्तीफ़ू तू बड़ा ही 'नॉटी गेम चेंजर' है - NDTV http://khabar.ndtv.com/news/blogs/ravish-kumar-dear-resignation-plz-read-my-letter-twice-773172 )

Sunday, May 10, 2015

Kabhi Meri Ghazale Bhi Padha Karo!

तुम खबरे पढ़ते पढ़ते मानो इन खबरों से ही बन गए हो।
कभी चहकते ही नहीं ...बस मायूस से हो गए हो।
उठते ही बलात्कार और खून की बाते करते हो..
रेल दुर्घटनाओ के बारे में पढ़ पढ़कर साईकल पे भी बैठने से डरते हो।
पिछले दिनों सलमान कांड से इतने प्रभावित हुए...
की फूटपाथ पर बैठे लोगो को हेलमेट गिफ्ट कर दिए।

राहुल बाबा के छुट्टी के बाद वाले भाषण सुनके खुदको कोसने लगते हो..
मोदी को वोट आखिर क्यों दे डाला दिन रात सोचने लगते हो।
इन सब से ऊब जाओ तो तीसरा पन्ना खोल लेते हो..
उनपर सितारों को चमकता देख..
खुदको भी घिसने लगते हो।

अखबार बहोत हुआ कहकर फिर t.v का रुख होता है..
बरखा दत्त , अर्णब की बेफुज़ूल की बहस सुना जाता है..
रजत शर्मा, राजदीप के सवालो से अपने ही दिमाग का दही करते हो।
रवीश की रिपोर्ट देख सच्चाई का दम भरते हो।

जानती हूँ तुम इन सब अखबारो और न्यूज़ चनेलो से अब थक गए हो
तुम खबरे पढ़ते पढ़ते मानो इन खबरों से ही बन गए हो।
कभी चहकते ही नहीं ...बस मायूस से हो गए हो।

कई बार सोचती हूँ तुमसे कहू...
सुनो! इन खबरों से यूँ मायूस न हुआ करो..
मायूस करने वाले इन खबरों की चंगुल से निकलकर...
कभी मेरी ग़ज़लें भी पढ़ा करो!!!
मेरी गज़ले तुम्हे जीने का सबब देंगी..
कुछ और करे न करे तुम्हे मायूस तो न करेंगी।
तुम उन्हें पढ़कर इक सुकून की सास लेना...
रोती हुई आँखों से इक बार फिर मुस्कुरा देना।

Friday, May 8, 2015

Kuch nazm aapki nazar.......

सुना है तमाम उम्र मेरी वफ़ा का हिसाब रखता रहा वो..
बेवफाई का रखता तो खाली कॉपी किसी और काम तो आती।

वो मिट गया...टुकड़ा टुकड़ा मेरी खातिर बिकते बिकते...
मैं अब तक सोचता हूँ इतने पैसो का उसने आखिर किया क्या होगा।

मेरी तारीफ में लिख दी थी उसने एक पूरी किताब...
हादसे के बाद पढ़ती हु तो झूठी लगती है सब।

वो मोहब्बत दिल में दबाये सालो मिलता रहा मुझसे...
जब मलबे में दबी लाश मिली उसकी...
तो बटवे में रखी तस्वीर से जाना मैंने।

रुक रुक कर चलता था तो गलफेहमि हो गयी...
मैंने उसकी मजबूरियों को मोहब्बत समझ लिया।

सुना है गरीबो को आजकल फुटपाथ पर नींद नहीं आती...
और नींद आ जाये तो फिर कभी आँख नहीं खुलती।

वो कुचलकर चला गया बस्तियाँ फिर भी...
लोग उसी की एक खरोच पर रोते रहे।

कहते है बस एक वचन निभाने को कोई 14 साल भटकता रहा...
अब सुना है किसीके भटकते कदमो को संभालने में 13 बरस बीत गए।


अंधेरो से अपनी इस कदर डरता है वो, की घर किसीका जलाकर भी रौशनी करता है वो।
अपनी सहूलियत से थी दोस्ती गहरी उसकी...
की कल किसीके लिए जीता था...आज किसी और पर मरता है वो।


वो दीवाली की रात थी
मैं समझता रहा मेरी याद में दिया जलाये बैठा है वो


तू पहले ही से इतना हसींन था
सजाकर मानो दुनिया से बैर मोल लिया मैंने

Wednesday, May 6, 2015

Salman fans के लिए कुछ ज्ञान....

शास्त्रो  का मुझे ज़्यादा ज्ञान नहीं है। न रामायण पढ़ी, न महाभारत... हाँ!  रामानंद सागर और बी.आर चोपड़ा जी की कृपा से इन दोनों ही ग्रंथो से जुडी कहानिया अच्छे से याद है। और इन कहानियो का निति रूप में विश्लेषण श्री राम किंकड जी महाराज  की ' नाम रामायण' पढ़ने से थोडा बहोत ज्ञात हुआ ।
रामायण के खलनायक, 'रावण' तथा महाभारत के खलनायक, 'दुर्योधन' में खलनायक होने के अलावा भी एक समानता और है। और वह ये की रावण के सीता हरण और दुर्योधन के द्रौपदी चीरहरण के दोष को छोड़ दे तो ये दोनों ही किसी महापुरुष से कम न थे। 
रावण एक शिवभक्त थे। लंका की प्रजा को उनसे कभी कोई शिकायत नहीं थी। शूर्पणखा से पूछने जाए तो पता चले की इस खलनायक जैसा तो और कोई भाई हो ही नहीं सकता। 
ऐसा ही कुछ दुर्योधन के साथ भी था। क्या कही किसी ग्रन्थ में ऐसा उल्लेख है की दूर्योधन के राज में प्रजा खुश नहीं थी? दुर्योधन भी श्री राम की ही भाँती एक पत्नी व्रत थे। अपने भाईयो के लिए तो वो लड़ मरने को तैयार थे। और उनकी मित्रता ने तो कर्ण जैसे सूत पुत्र को राजा बना डाला।
परंतु इन सब अच्छाईयो के बावजूद जो एक जघ्घ्न्य अपराध् इन दोनों ने किये उसके लिए स्वयं भगवान् को इनके प्राण लेने पड़े। यदि भगवान् ऐसा न करते और उनकी बाकी अच्छाईयो को देख उनके इस एक अपराध् को क्षमा कर देते तो शायद हम ये पाठ कभी न पढ़ पाते की बुराई पर अच्छाई की हमेशा जीत होती है।
हर व्यक्ति में कुछ न कुछ अच्छाई होती है। हो सकता है जिस व्यक्ति ने आपकी मेहनत की कमाई चुराई हो या आपके किसी सगे का खून किया हो वो निजी जीवन में एक बहोत अच्छा पति, भाई , बेटा या पिता हो। ये भी हो सकता है की वो एक समाज सुधारक हो या संत हो या खूब सारी fan following वाला कोई दिग्गज हो। पर इन सबकी वजह से उसका अपराध पूण्य में नहीं बदल जाता।
अच्छाई के लिए जिस तरह दिग्गजो को आम आदमी के मुक़ाबले ज़्यादा मान मिलता है, उसी तरह बुराई के लिए उन्हें आम आदमी के मुकाबले ज़्यादा कड़ी सजा भी होनी ज़रूरी है। कारण एक ही है .. सामाज इन्हें अपने आदर्श के तौर पर देखता है। और यदि आदर्श के आदर्शो में चूक हो तो समाज भी चूक सकता है।

Friday, April 24, 2015

Rudaali!

कई साल पहले एक पिक्चर देखी थी.... 'रुदाली ' . शायद कुछ अवार्ड्स वैगेरह भी मिले थे उसे।  कहानी उस  वक़्त की थी जब बड़े बड़े ज़मींदार घर के किसी बुजुर्ग के मर जाने पर किराये पर रुदाली(रोने वाले ) मंगवाते थे क्यूंकि स्वयं उन्हें उस बुजुर्ग के मरने  का कोई दुःख नहीं होता था और ज़ाहिर है दुःख न होने के कारण रोना भी नहीं आता था।  नायिका (डिंपल कपाड़िया ) के घर में पीढ़ियों से रुदाली बनकर पैसे कमाने का चलन था।  नायिका की माँ (राखी ) तो जानी मानी रुदाली हुआ करती थी। पर नायिका की आँखों में चाहकर भी कभी आंसू नहीं आते थे।  बड़ी बड़ी मुसीबते आई पर नायिका कभी नहीं रोई। पर अंत में अपना पेट पालने के  लिए वो रुदाली बन जाती है.... फूट फूट कर रोती है।
ऐसा ही है भइ....  कई बार अपना पेट पालने के लिए रोना आये न आये.... रुदाली बनना पड़ता है।  हाँ डिंपल कपाड़िया जैसी एक्टिंग की अपेक्षा आप हर किसीसे तो नहीं न कर सकते।  

Monday, April 20, 2015

Tum Chahti ho.....



तुम चाहती हो तुम्हे कम कपड़े पहनने की आज़ादी हो...
हम चाहती है हमारे पास बस तन ढांकने  जितनी खादी हो...

तुम चाहती हो, तुम वज़न बढ़ाना चाहो या घटाना, इस पर कोई ज़ोर ना हो...
हम चाहती है, अपने बच्चे को खाना ना दे सके, ऐसी कोई भोर ना हो..

तुम चाहती हो पूरी आज़ादी यौन संबंध रखने की..
हमे उम्मीद है किसी दिन अपना शरीर बेचे बगैर रोटी का स्वाद चखने की

तुम चाहती हो घर देर से आना बिना सवालो जवाब के..
हम जैसो के लिए घर जाना ही है ख़यालो ख्वाब से...

तुम आज़ाद हो...फिर भी चाहती हो आज़ादी को अपने रूप मे ढालना
हम क़ैद है... मुश्किल है इन दलालो के चंगुल से निकलना

तुम कुछ भी कह लो फिर भी लोग आरज़ू रखते है तुम्हारी..
हम कुछ नही कहती...फिर भी बाज़ारो मे आबरू बिकती है हमारी...

क्यूँ ना मैं और तुम मिलकर आज़ादी की एक नयी परिभाषा बनाए..
मर्द हो चाहे औरत...मर्यादा सबकी हो पर कोई किसी की इस मर्यादित आज़ादी को न ठेस पहुचाए। 


Friday, April 17, 2015

विजय माल्या के दुःख में शामिल होते हुए .....

दादा की एक पुरानी स्कूटर हुआ करती थी, बजाज की, हल्के पीले रंग की. दूर से ही पहचान लिए जाते थेे दादा उस स्कूटर की कृपा से।  जब कुछ ज़्यादा खटारी हो गयी तो  बेचने का विचार आया।  लोगों ने सुझाव दिया की किसी मेकॅनिक को बेच दे, जो उसके पुरज़ो को अलग अलग करके बेच देगा।  बाबा इस बात पे सहमत ना हुए और कही से स्कूटर को ठेलकर चलाने के लिए तय्यार एक ग्राहक ढूंड ही लाए. तब बाबा या दादा की स्कूटर के प्रति उस भावना को समझ  नही पाई थी।  पर कुछ वर्षो बाद मेरी 'बजाज सन्नी' का भी कुछ ऐसा ही हाल हुआ। गिरा गिराकर इंजिन  तक तोड़ डाला था मैने उसका।  बेचने की बारी आई तो वही बस एक मेकॅनिक और रद्दी वाले ही आगे आए खरीदने।  मेकॅनिकल इंजिनियरिंग की थी. 4000 रुपये की नौकरी थी. हॉस्टिल का किराया बकाया था।  घरवालो से मांगती तो घर वापस बुला ली जाती।  सो चढ़ा दी बलि अपने आज़ादी के एक मात्र वाहक बेचारे 'बजाज सन्नी' की ।  बहोत दुख हुआ।  बड़ा  ग़रीब ग़रीब सा फील हुआ।
 उस दिन मेरी सन्नी को रद्दी वाले को ना बेचती तो शायद बाकी दुनिया की तरह मैं भी विजय माल्या  का मज़ाक उड़ा रही होती . पर विजय माल्या  जी आज मुझे आपसे पूरी सहानुभूति है. बात चाहे ग़रीब के स्कूटर या सन्नी की हो या अमीर के हवाई जहाज़ की... रद्दी मे बेचनी पड़ जाये तो ग़रीब ग़रीब सा फील होता ही है. चिंता ना करे ..कुछ सालो बाद अब मैने होंडा एक्टिवा खरीद ली है. आशा करती हू आप भी एक बेहतर हवाई जहाज़ जल्द खरीद लेंगे.
शुभकामनाओ के साथ
आपके दुख मे शामिल,
मानबी

Thursday, April 16, 2015

Kitaabi Duniya!!

किताबी दुनिया.... हसीन...तरीन...
कभी सवाल ना पूछने वाली..
कभी तस्वीर ना माँगने वाली...
आप चाहे मेट्रिक पास हो, चाहे P.H.D.....
चाहे काले भद्दे से नाक वाले , चाहे खूबसूरत आँखो वाले ..…
आप बेझिझक इस किताबी दुनिया मे रह सकते है।
किताबे बोलती नही...पर आपको यदि उसकी किसी कहानी से प्यार हो जाए तो आप बेझिझक बोल सकते है। मन किया तो रात भर सीने  से लगाकर सो सकते है. किताबे लांछन नही लगाती..... शिकायत नही करती की इस तरह सीने से लगाने का आपका क्या मतलब था??
काश हमारी असल दुनिया भी ऐसी ही होती...बिल्कुल किताबी दुनिया की तरह...
काश यहा रहने वाले लोग इन किताबो की तरह होते.. जो ना सवाल पूछते... ना तस्वीर माँगते...

Wednesday, April 15, 2015

 आम्बेडकर जयंती.... 'नयी सड़क'... क्लास और कास्ट का फर्क



कल आम्बेडकर जयंती थी।  देश भर में दलितों के हक़ के विषय में बाते  की गयी।  रविश कुमार की  'नयी सड़क' और ndtv के 'प्राइम टाइम' की तरफ, देश के कई और देसी लोगो की भाँती, मेरा भी खास झुकाव है। प्राइम टाइम में कल  रविश जी ने, नितिन के कॅमेरे से आम्बेडकर जयंती का जश्न दिखाया।  शैनन नामक पत्रिकारिता की छात्रा के हाथो में iphone  और  आँखों में आँसू दिखाए।  एक महिला को आंबेडकर जी की तस्वीर खरीदते हुए दिखाया। रविश जी के पूछने पर महिला ने बताया की एक car में आलरेडी ये तस्वीर है , अभी दूसरी कार के लिए ले रही रही है। आज 'नयी सड़क' पर देखा तो शैनन की भावुक कहानी थी।

इसी तरह आमिर खान के 'सत्यमेव जयते' की भी मैं फैन रही हु।  जब पिछले सीजन के एक एपिसोड के विज्ञापन में आमिर ने कहा की वे निचली जाती के बारे में बात करेंगे तो मैंने प्रोग्राम से कुछ उम्मीदे बाँध ली।  जब एपिसोड आया तो उसमे भी केवल दलितों पर अत्याचार और उनके संघर्ष की कहानी  थी। उसके 
बाद की कहानी कही नहीं थी...

अभी कुछ समय पहले प्रधानमंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी ने देश के फलते फूलते लोगो से अपील की, कि वो अपना एक हक़ अपने कम फलते फूलते भाईयो के लिए त्याग दे।  सुनकर ख़ुशी हुई। पर पता चला प्रधानमंत्री जी तो बस एलपीजी में सब्सिडी की बात कर रहे है।  
काश स्वेच्छा से ये फलता फूलता वर्ग एक और हक़ छोड़ देता तो शायद देश में समानता की कुछ गुंजाइश बनती।

आज मेरी घरेलु मदतगार (maid ) अपनी बेटी को साथ लेकर आई।  सुबह  सुबह नींद से जागते ही खेलने के लिए किसी को पाकर मेरी बच्ची खूब खुश हुई।  दोनों ने साथ बैठ नाश्ता किया , T.V  देखा और खूब खेले।  वेणी को सिर्फ तमिल आती थी और मेरी बेटी मिष्टी को हिंदी, अंग्रेजी और बंगाली। सो भाषा का थोड़ा अंतर रहा पर कुछ देर तक।  थोड़ी ही देर में दोनों ऐसे घुल मिल गयी जैसे वर्षो से जानती हो एक दूसरे को। 
मैं नहीं जानती की वेणी की जाती क्या है।  वेणी की माँ को मैंने बिना जाती पूछे ही नौकरी पर रखा था।  पर यदि वो सरकारी नौकरी मांगने जाती तो जाती पूछी जाती, वर्ण पूछा जाता।  और संभवतः उची जाती का होने की वजह से नौकरी से वंचित ही रखा जाता।
मेरा बचपन भी कुछ इसी तरह गुज़रा।  कॉलोनी के सारे बच्चे किसी न किसी के आँगन में रोज़  खेलते मिलते।  किसी की  क्या ज़ात थी ....  अब तक नहीं पता।  माँ बाबा ने न  कभी किसी के  साथ खेलने से रोका, न किसीका कुछ दिया खाने से और  न ही किसीके घर जाने से।  किसीकी कास्ट का  पता नहीं होता था , पर हाँ 'क्लास' का पता ज़रूर हो जाता था।  कभी किसी के पहनावे से तो कभी बड़ो के व्यवहार से। गुड़िया के पापा अफसर है और मेरे बाबा क्लर्क , ये फर्क तो बचपन में  खेल खेल में भी महसूस कर लिया था मैंने

अब शैनन के दुःख के साथ सहानुभूति रखते हुए ये किस्सा बताती हु जहाँ से मुझे कास्ट का ज्ञान हुआ।

बारवी में ठीक ठाक ही परसेंटेज  आये थे।  उन दिनों कोई एंट्रेंस नहीं होती थी इंजीनियरिंग में दाखिले के लिए।  बारवी के नम्बरो के आधार पर एडमिशन होती थी।  बाबा का सपना था की उनके दोनों बच्चे इंजीनियर बने। दादा बन चुके थे और अब मेरी बारी थीं। 
नागपुर के V.R.C  में बैठे, मैं अपने नम्बर के इंतज़ार में थी।  तीन लोगो को एक साथ बुलाया गया।  स्क्रीन पर जनरल केटेगरी में सिर्फ मैकेनिकल और सिविल ही नज़र आ रहे थे।  दादा ने हिदायत देकर भेजा की मैकेनिकल ले लु।  

बातूनी तो मैं हूँ ही इसलिए मुझसे आगे जो लड़की खड़ी थी उस से युही पूछ लिया की "तुम सिविल लोगी या मैकेनिकल?"   जवाब आया, "मैं तो कम्प्यूटर्स लुंगी " . मुझे  लगा शायद उससे स्क्रीन देखने  में कोई चूक हुई है।  मैंने उसे बताया की " अरे तुम कौनसे खयालो में हो? नज़र उठाकर  देखो हमारे पर्सेंटेज के लिए सिर्फ सिविल और मैकेनिकल ही बचता है।"  वो हसी , बोली, "तुम जनरल केटेगरी  की हो क्या ? मैं तो S.T  हुँ।  मुझे तो L.E.T में इलेक्ट्रॉनिक्स  भी मिल रहा था पर मुझे कम्प्यूटर्स ही चाहिए :) " 

 फिर मैंने उससे उसके  परसेंटेज पूछे।  ओवरआल मुझसे २ परसेंट कम  और P.C.M  में मुझसे ५ पर्सेंट कम। सुनकर अनायास ही घृणा होने लगी उससे।
"हमारी तो फीस भी माफ़ हो जाती है , मेरी मम्मी प्राइमरी टीचर है न :) " - उसने कहा।
"wow  … और पापा? पापा क्या करते है तुम्हारे ? - मैंने  व्यंग में पूछा।
" डॉक्टर है।  Dr. वाघमारे (नाम बदला हुआ ) का नाम नहीं सुना ? जिनका अशोक चौक पर बड़ा सा हॉस्पिटल है , वो मेरे पापा है" - उसने उत्तर दिया।

उसका नंबर आ गया।  उसने नागपुर के एक  कॉलेज   में कम्प्यूटर्स ले लिया। ज़्यादा  नंबर होते हुए भी मेरे पास मैकेनिकल लेने के अलावा और कोई चारा नहीं था।

मेरे पिता क्लर्क थे। पर वर्ण से क्षत्रीय।  क्लास का फर्क मैंने बचपन से सीखा था। ये वो किस्सा था जिसने मुझे कास्ट का फर्क सिखाया।