Thursday, February 22, 2018

Adorer Naam

We Bengalis always have two names - one used for the outer world and the other Adorer naam or daak naam(pet name)!
Maa had two too. Her Adorer naam was 'Khukhu'(little girl).
Though I met my maternal grandparents very few times, still I remember them calling Maa as Khukhu.
But I heard Baba always calling her Khukhu.
Baba got a brain stroke 7 years ago. He lost his speech for sometime. He can speak now but not clear enough.
No one calls Maa now by her Adorer naam - Khukhu!

Wednesday, February 21, 2018

हैरी पॉटर


ऑफिस में सब हैरी पॉटर पढ़ते हैं। उनकी बिरादरी में शामिल होने के लिए मैंने भी कई बार कोशिश की कि हैरी पॉटर पढूं और जितना मज़ा मंटो पढ़ते हुए लेती हूं उतने ही मज़े से पढूं। पर मज़ा नही आता...और मैं हर बार हैरी के उस जादुई स्कूल में पहुंचने से पहले ही हार मान जाती हूँ।

ऑफिस में कोई गुलज़ार नही पढ़ता। ऑफिस में कोई रितुपोर्नो की मूवीज नही देखता।

कल 'त्रिवेणी' एक बार फिर पढ़ी। पिछले महीने शरू की रितुपोर्नो की 'शोब चोरित्रो काल्पनिक' खत्म की।

वो सीन याद आता रहा जहां राधा इंद्रनील की आखरी कविता पढ़ती हैं, और चीखती है उसपे कि उसने, उसकी कविता क्यों चुराई। कुछ समझ नही आता...
और अगले ही सीन में वो अपनी अंग्रेज़ी कविता सुनाती हैं जो हूबहू इंद्रनील की बंगला कविता से मेल खाती हैं।

त्रिवेणी के पहले दो शेर मुकम्मल तो लगते हैं। पर कवि क्या कहना चाह रहा हैं ये तीसरे मिसरे से ही पता चलता हैं।

मैंने रितुपोर्नो की कई मूवीज देखी। गुलज़ार को कई बार पढ़ा। पर कल ये दोनों पहली बार एक से लगे। जैसे बरसो की दोस्ती हो इनकी...और फिर नौकरी चाकरी के चक्कर मे अलग अलग देश चले गए हो...मिलते नहीं...पर अब भी एक सा सोचते हो...अब भी कोई एक सा तकियाकलाम हो उनका...अब भी कोई ऐसी एक गुप्त बात हो उनकी जिस पर वो दोनों ही हंस सकते हो...

पर ये दिलचस्प बात किससे कहूँ? रितुपोर्नो और गुलज़ार एक से हैं इस पर घंटो किससे गप्पे लड़ाऊं? ऑफिस में तो सब हैरी पॉटर पढ़ते हैं!
ऑफिस में कोई गुलज़ार नही पढ़ता....ऑफिस में कोई रितुपोर्नो की मूवीज़ नही देखता...

https://youtu.be/9a0mNDKWBpI

Thursday, February 15, 2018

हिंदी बोलने वाला

मैं हिंदी की खाता हूं...उसीसे ज़िंदा हूँ
ये और बात है कि इसी बात पर मैं शर्मिंदा हूँ

वो अंग्रेज़ी बोलता, कहता है उसीसे जीता है
उसीमे मुझको ज़ख्म देता, उसीसे सीता है

सजी है शायरी उसकी आला उर्दू में
मैं हिंदी के लहजे में एक लफ्ज़ भी कह लूं तो उसको चुभता है

वो बचपन से अपनी मादरी ज़ुबाँ का आदि है
उसे लगता है मेरी कोशिश उसकी भाषा की बर्बादी हैं

वो अफसर के घर पैदा हुआ मिली किताबे उसे
मेरे पिता मज़दूर थे कोई बता दे उसे

माना कि उसने सब कुछ पढ़ पढ़ के जाना है
मेरे अपने अनुभव हैं, सीखने का यहीं एक बहाना हैं

मैं उसे सुनकर उसका मुरीद बन बैठा
वो भी कभी सुनेगा मुझे इसकी उम्मीद कर बैठा।

Ghutan घुटन!

क्यों जकड़ रखा है तुमने भाषा, ज्ञान, लिंग, संस्कृति, धर्म और मनोरंजन को उन बेड़ियो में जिनके चंगुल से वो चाहकर भी निकल नही सकते?
आखिर क्यों तुम्हे लगता है कि उच्चारण पर सिर्फ तुम्हारा अधिकार है?
तुमने पढ़ी होंगी ढेर ढेर किताबें
धर्म का तुमको इल्म मुझसे कई ज़्यादा होगा
तुम जाते होंगे किसी कॉन्वेंट में
और कुकम्बर को क्युकम्बर कहना सिखा होगा अपनी ईसाई टीचर से
तुम्हारे मदरसे में बताते होंगे कि खान epiglottis से आना चाहिये
और हिंदी के जानकार से सीखी होंगी तुमने सतरह और सतारा का फर्क
तुम अच्छे स्कूल में जाते होंगे तभी तुम्हे मालूम हैं कि हमारा देश उसकी संस्कृति से जाना जाता है
और तुम्हे बचपन से फैशन की हिदायते मिलती होंगी तो तुमने जाना कि लाल होंठो के साथ हरा चोला देहाती लगता है।
तुम्हे हैरी पॉटर का पता मेरे चाचा चौधरी से पहले लगा होगा
तुम्हारा स्टेटस सिंबल अंग्रेज़ी रहा होगा
पर ....पर तुम सब कौन होते हो... भाषा, धर्म, सांस्कृति , मनोरंजन को बेड़ियों में बांधने वाले?

Saturday, February 10, 2018

मैं मिडल क्लास कहलाता हूँ

पराँठे पसंद होते हुए भी
ब्रेकफस्ट में कॉर्नफ़्लेक्स खाता हूं

चाय की चुस्की छोड़ दी कब से
कड़वी कॉफी किसी तरह पी जाता हूँ

जेब पे भारी पड़ने वाली एक्सोटिक फ्रूट्स खाता हूं
पर सब्जीवाले से अब भी धनियां फ्री में ही लाता हूँ

भले ही दो रोटी कम खाऊं
पर बच्चो को इंटरनेशनल स्कूल में पढ़ाता हूँ

खुद लटक लटक के पास हुआ पर
पर बच्चो से अंग्रेज़ी ही बुलवाता हूँ

लोग क्या कहेंगे इस डर से
माँ को बेमन से साड़ी दिलाता हूं

स्टेटस मेन्टेन करने की खातिर
बीवी को भी शॉपिंग कराता हूँ

एयरपोर्ट पे बेशक भूल जाऊं,
पर फेसबुक पे चेकइन करना कभी नही भुलाता हूँ

नोटबंदी हो चाहे जीएसटी लगे
मंथ एन्ड में उधार से ही घर चलाता हूँ

घर की ईएमआई देते देते अक्सर भगवान को प्यारा हो जाता हूँ

न गरीबी रेशा के नीचे न अमीरी के ऊपर.. मैं मिडिल क्लास कहलाता हूँ।

© मानबी कटोच

Tuesday, January 30, 2018

I will be raped!

The news in the morning said I will be raped
I will be raped if I wear a skirt
Coz it's kind of a sign to the men to take off my shirt
I will be raped if my lips are red
Coz that's quite enough to boil their blood
I will be raped if I get back late
And need to accept it as my fate
Wearing a jeans will be my fault
Coz these types of girls get raped by default
I will be raped if I smile
I will be raped every while
I will be raped if I care
I will be raped if I dare
I will be raped if I fight
I will be raped coz men are always right.
The news in the morning said I will be raped
But I just ignored it as I do none of them
I just stay home and stay with mum
I don't speak to boys as that's the advice
And thought to myself, "ohh am so wise"
To not get raped, I followed all the rules
And those who get raped I thought were fools
For what is so hard to not get raped
It's not that tough I would always debate..
And I lived happily ever....but wait wait wait
Until one day when my mum came late
He took off my diaper....and I was RAPED!!!!

Thursday, September 28, 2017

एकला चोलो रे....

दुर्गा अष्टमी की संध्या थी... मेरे अंदर का बंगालीपन अचानक जाग उठा और मैं गाने लगी...
"जोदी तोर डाक शुने केयू ना आशे तोबे एकला चोलो रे...."
एक दो लाइने गाने के बाद मिष्टी भी साथ हो ली और हम दोनों संग संग गाने लगे...

" जोदी केयू कोथा ना कोये....ओरे ओरे ओ ओभागा केयू कोथा ना कोये....जोदी शोबाई थाके मूक फिराये शोबाई कोरे भोये..."

गाना खत्म होते ही मिष्टी के चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान थी...
मैने उसे बताया कि ये रबिन्द्रनाथ टेगोर का लिखा हुआ गाना है।

मिष्टी ने तुरंत पूछा - "क्या मतलब है इसका?"

मैंने बताया - " इसका मतलब है कि अगर तुम्हारे बुलाने पे कोई न आये तो तुम अकेले चलो।"

मिष्टी - "ऐसा क्यों कहा रबिन्द्रनाथ टेगोर ने?

मैंने थोड़ा इतिहास समझाया और कहा कि ये आज़ादी की लड़ाई के दौरान लिखा हुआ गाना है। शायद वो कहना चाहते थे कि इस लड़ाई में कोई अगर तुम्हारा साथ न भी दे तो तुम अकेले ये लड़ाई लड़ो।

मिष्टी - पर वो तो राइटर थे...लड़ाई तो नही करते थे।

मैं - हाँ पर हो सकता है, ये उन्होंने आज़ादी की लड़ाई लड़ने वालों को सोच कर लिखा हो।

मिष्टी - (बिल्कुल तपाक से) मम्मा ये भी तो हो सकता है कि वो अकेले ही लिखते थे ना...

मैं - हाँ...

मिष्टी - तो उन्होंने किसीको लिखने के लिए बुलाया हो और वो नही आये तो वो अकेले ही लिखते रहे।

मैं - हाँ बेटू..ऐसा तो हमने कभी सोचा ही नही...ऐसा हो सकता है।

मुझे अपनी बात मानते देख मिष्टी खुश हो गयी और फिर से अपने खेल में मस्त हो गयी।

सच है! शायद रबिन्द्रनाथ ने इस बात की कभी परवाह नही की, कि कोई उनकी तरह लिख रहा है या नही...उन्हें जो कहना था...जो लिखना था ...वो अकेले ही लिखते चले गए... शायद तभी वो राबिंद्रनाथ बन पाए!
लेखक या कवि यदि इस भय से लिखने लगे कि उनके साथ कोई है या नही तो शायद फिर कभी कोई भी लेखक या कवि रबिन्द्रनाथ नही बन पाएगा!